कोलकाता: कोलकाता के पार्क स्ट्रीट इलाके में फुटपाथ पर एक महिला द्वारा दूध गर्म किए जाने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल अतिक्रमण या मानवीय संवेदना के सवाल तक सीमित नहीं रहा। पश्चिम बंगाल की शहरी विकास मंत्री और भाजपा विधायक अग्निमित्रा पॉल ने इस विवाद को राज्य में निवेश, रोजगार और शहर की छवि से जोड़ दिया है। उनके ताजा बयान के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
पार्क स्ट्रीट में निरीक्षण के दौरान पॉल ने फुटपाथ पर केरोसिन स्टोव पर दूध गर्म कर रही महिला को टोका था। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद विपक्ष और समाज के एक वर्ग ने मंत्री की आलोचना की। आलोचकों का सवाल था कि फुटपाथ पर रहने को मजबूर गरीब परिवार के साथ प्रशासन का व्यवहार कैसा होना चाहिए। इसके बाद पॉल ने लगभग आठ मिनट के एक वीडियो संदेश के जरिए अपना पक्ष रखा।
‘क्या निवेशक ऐसे शहर में आएंगे?’
अग्निमित्रा पॉल ने अपने बचाव में सवाल उठाया कि यदि दूसरे राज्य या विदेश से कोई निवेशक कोलकाता आता है और उसे फुटपाथों पर अतिक्रमण, सड़कों की स्थिति, ट्रैफिक जाम और बुनियादी ढांचे की समस्याएं दिखाई देती हैं, तो क्या वह यहां निवेश करना चाहेगा? उनका तर्क था कि निवेश और रोजगार के लिए शहर की साफ-सुथरी और व्यवस्थित छवि जरूरी है।
यहीं से यह विवाद एक बड़े नीति-सवाल में बदल जाता है। शहर की सुंदरता, यातायात और सार्वजनिक स्थानों को व्यवस्थित करना निश्चित रूप से किसी भी महानगर के लिए जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ फुटपाथ पर रहने वाले परिवारों, छोटे दुकानदारों और हॉकर्स की आजीविका का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए केवल अतिक्रमण हटाना पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता; पुनर्वास और वैकल्पिक आजीविका की व्यवस्था भी शहरी नीति का हिस्सा होनी चाहिए।
सरकार बनाम विपक्ष: ‘मानवीयता’ पर बहस
पॉल ने कहा कि जिस बच्चे की उम्र करीब छह महीने है, वह सड़क और वाहनों के बीच असुरक्षित स्थिति में था। उन्होंने दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी तय करने का सवाल भी उठाया। मंत्री ने यह भी कहा कि सरकार स्लम विकास और पुनर्वास के लिए वाणिज्यिक संगठनों के साथ बातचीत कर रही है।
दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उस फुटपाथ निवासी महिला को मदद की पेशकश की है। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर पार्टी के किसी नेता के घर में उसके रहने की व्यवस्था की जा सकती है और बच्चों की शिक्षा में भी सहायता दी जाएगी।
सीपीएम के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने भी भाजपा के मंत्रियों और विधायकों के रवैये की आलोचना करते हुए इसे कथित तौर पर ‘सामंती’ मानसिकता से जोड़ा।
असली सवाल क्या है?
इस विवाद को केवल ‘फुटपाथ बनाम निवेश’ के रूप में देखना अधूरा होगा। निवेशकों के लिए बेहतर सड़कें, सुचारु यातायात, स्वच्छ सार्वजनिक स्थान और कानून-व्यवस्था महत्वपूर्ण हैं। लेकिन किसी महानगर की निवेश-अनुकूल छवि का मूल्यांकन सामाजिक समावेशन के आधार पर भी होता है।
इसलिए सरकार के सामने चुनौती दोहरी है—शहर को व्यवस्थित करना और गरीबों की आजीविका तथा सम्मान की रक्षा करना। यदि अतिक्रमण हटाने के साथ पुनर्वास, हॉकिंग ज़ोन और सामाजिक सुरक्षा की प्रभावी व्यवस्था बनती है, तो यह विवाद एक व्यापक शहरी सुधार की दिशा में बदल सकता है। लेकिन यदि कार्रवाई केवल गरीबों को हटाने तक सीमित रहती है, तो राजनीतिक विवाद आगे भी जारी रहने की संभावना है।





